गरुड़ पुराण का वो खौफनाक सच, जिसे सुनकर रूह कांप जाएगी! ।। अध्याय 3।।

*"Welcome to a world where death is not the end but the beginning of a journey. I am Umesh Rathod, and here I unravel the mysterious layers of the Garuda Purana, which today's world is unaware of. Are you ready?
 




पहला पिंड - मुख स्थान पर
दूसरा पिंड - दुआर पर                         
तीसरा पिंड - चौराहे पर
चौथा पिंड - विश्राम स्थान पर
पांचवां पिंड - चिता पर

छटा पिंड - अस्थि -संचयन के समय
~ शमशान घाट से आधा रास्ता पर रूक कर , लाश को स्वच्छ स्थान पर नेहला कर चारों दिशाओं में पूजा करनी चाहिए । तब इसे शमशान भूमि पर , सर उत्तर दिशा में करके लेटाना चाहिए ।
~ जलने वाली जगह को साफ़ करके ,गोबर का लेप करें । इस स्थान पर पहले कोई लाश न जली हो ।
~ कुछ मिटटी बटोर कर उस की मूर्ती बना कर ,पानी से छिडक कर पूजा करके अग्नि की स्थापना करें.। 
~ अग्नि की पूजा रंगदार चावलों से करते हुए अग्नि शक्ति को सम्भोदित करें :" लोमान ,इस संसार से यह प्राणी चला गया है , इस आत्मा को स्वर्ग प्रदान करें "
~ इस के बाद चिता का निर्माण करें / लाश को उसपर रखें /मृतक के हाथों में , और चिता पर "लाइ" के दाने रखें । इस प्रकार मृतक को 5 "लाइ" के दाने मिलने से वह घर वालों को परेशान नहीं करता । 
~ शमशान भूमि में , शूद्रों दुआरा पहुंचाई गई वस्तुओं से वहां किया गया सम्पूर्ण कर्म निष्फल हो जाता है ।
~ किसी कारण वश उपर्युक्त पिंड न दिए जाने पर , शव राक्षों के भक्षण -योग्य हो जाता है ।
~ दाह - कार्य में चंडाल के घर की अग्नि , चिता की अग्नि और पापी के घर की अग्नि का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।
~ जब चिता में ,शव का आधा शरीर जल जाय ,उस की खोपरी को किसी लकड़ी के डंडे से भंग करके { ताकि वह पित्तरों की दुनिया में चला जाये },तिल मिश्रित घी अर्पित करे । पुत्र को इस समय भाभुक हो कर रोना चाहिए ,ताकि वह सदा प्रसन्न रहे ।
~ जब चिता जल कर समाप्त हो जाये ,तो पहले स्त्रिओं को , बाद में पुत्रों को नहा कर , नीम वृक्ष का एक एक पत्ता खाना चाहिए । घर को जाने के समय इस्त्त्रिओन को आगे चलना चाहिए । 
~ दोबारा घर में स्नानं करने के बाद , पुत्र को पहिले गौ को खाना देकर, पत्ते की प्लेट पर स्वय खाना ,खाना चाहिए , किन्तु खाना पहले से ही बना नहीं होना चाहिए ।
~ मृतु वाली स्थान को गोबर से साफ़ करके, एक दीपक ( जिस का मुख दक्षिण की तरफ रहे ,) १२ दिन तक उस स्थान पर जलता रहना चाहिए ।
~ अग्नि दाह "पंचक " में नहीं करना चाहिए । जो प्राणी "पंचक" में प्राण त्यागता है , उस की मुक्ति नहीं होती
~ दाह - संस्कार भी नहीं करना चाहिए वरना घर में एक और मृतु हो सकती है ।
~ मास के प्रारम्भ में " धनिष्ठा" नक्षत्र के अर्ध भाग से लेकर " रेवती नक्षत्र " तक का समय पंचकल कहलाता है । पंचक में दाह संस्कार करना हो तो कुश के मानवकार चार पुतले बना कर नक्षत्र मन्त्रों से उनको अभिम्न्त्तिरित करके शव पर रख दें और उन्ही पुतलों के साथ दाह -संस्कार करें.। पुत्रों दुअरा पंचक शांति भी करवानी चाहिए 
~ तीन दिन तक , चौराहे पर , या चिता वाली ज़मीन पर , एक मिटटी के कच्चे बर्तन में ,जो की तीन लकड़ी की डंडियों से बंधा हो ,दूध और पानी से भरा हुआ ,अर्पण करे ।
~ दाह क्रिया के बाद , अस्थि -संचयन क्रिया करनी चाहिए । इस के बाद दाह - क्रिया के समय 6 पिंड तथा दशगात्र के अंतर्गत 10 पिंड दान आदि की प्रिक्रिया बताई गई है।
~ चौथे दिन अस्थि -संचयन करनी चाहिए । यदि कोई रूकावट न हो ,तो दूसरे अथवा तीसरे दिन भी कर सकते हैं  
~ शमशान घाट पहुंच कर ,स्नानं करके,गर्म दुशाला ले कर , अनाज का दान ,चिता वाली जगह पर देवी -देवताओं को नमस्कार करके , ३ चक्कर काटते हुए "यामायात्वा " मन्त्रर का उच्चराण करते हुए , दूध का व फिर पानी का छींटे दे कर ,चिता में से अस्थिओं को इकठा करो । 
~ अस्थिओं को "पालाषा "के पत्तों पर रख कर , दूध और पानी से छिड़क कर , एक मिटटी के बर्तन में रखें । श्राद्ध की रसम पूरी करें । 
~ एक तिकोने ज़मीन के टुकड़े को गोबर से पोत कर , उत्तर दिशा की ओर मुख करके , 3 लाइ , तीनो दिशाओं में अर्पण करें ।
~ अस्थियाँ इकठी करने के बाद , एक तीन टांगों वाले स्टूल पर , बिना मूंह ढके , पानी से भरा हुआ एक जार रखें । 
~ मृतक के लिए उबला हुआ चावल के साथ , दही, घी ,पानी और मिठाई अर्पण करें ।
~ 15 कदम उत्तर दिशा की ओर चल कर , ज़मीन में एक गड्ढा बना कर ,अस्थिओं वाला बर्तन उस में रखें ।
एक लाइ इस पर रख कर ( जलने के समय जो पीड़ा हूई ,उसे दूर करती है ),बर्तन को किसी वाटर टैंक के पास ले जाएँ । 
~ अस्थिओं को कई बार दूध और पानी से छिडक कर ,संदल आदि से लेप कर , पूजा करें / पत्ते के डिब्बे में रख कर ,अपने माथा और हृदय से छू कर गंगा नदी के बीच में छोड़ें ।
~ जिन की अस्थियां , पानी में 10 दिन के अंदर डूब जाती हैं ,वह आत्मा ब्रह्म लोक से वापिस नहीं आती ।
~ जितनी देर तक अस्थियाँ तैरती रहती हैं , वह स्वर्ग लोक में रहता है ।
~ अस्थियां विसर्जन के बाद 10 दिन चलने वाली रस्में शुरू होती हैं. ।
अकस्मात मृत्यु
कार्यक्रम की सूची :-

~ किसी अज्ञात जगह पर होने से ,और शरीर न मिलने पर, जिस दिन यह खबर मिले ,दर्भा घास की प्रतिमा बना कर उस को जलाएं । इस की राख इकठी करके गंगा नदी में विसर्जन करें । उस दिन से 10 दिन की रस्में पूरी करें । 
~ यदि महिला बच्चा होने से पहले मर जाए , तो बच्चे को पेट से निकाल कर, ज़मीन पर रख दें और केवल महिला को चिता दें ।
~ 27 मास तक के बच्चे को मिटटी में दबाएँ / यदि इस की मृतु गंगा किनारे होती है तो इसे गंगा में बहा दें।
~ इन से बड़े बच्चों को चिता देनी चाहिए और अस्थियाँ गंगा में बहा दें/ बच्चों को खाना और एक एक बर्तन पानी का दें.।
~ पेट में बच्चा मरने से कोई रस्म नहीं ।
~ शिशु के मरण पर दूध का दान, बच्चे के मरण पर दूध का बर्तन ,मिठाई , खाने की वस्तुएं दें । 
~ मलिन्शौद्शी के बाद मध्य्म्शौद्शी श्राद्ध - विष्णु और पांच देव श्राद्ध , एकादश को किये जाते हैं । विद्वान ब्रह्मिनों को कुश या चावल के चूरन से ही सांड का निर्माण करके उसका उत्सर्ग करना चाहिए।


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